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राजस्थान के जालोर जिले की रेतीली ज़मीन, कम बारिश और भीषण गर्मी. ऐसी जगह जहाँ खेती को हमेशा जुआ माना जाता रहा. यहीं सायला तहसील के दुधवा गाँव के एक पाँचवीं पास किसान ने वो कर दिखाया जिसकी कल्पना भी आसपास के लोग नहीं कर पाते थे. कभी गेहूँ, बाजरा और अरंडी से सालभर में मुश्किल से ₹50 हजार कमाने वाले नारिंगाराम मालारामजी चौधरी आज अनार की खेती से करोड़ों की आय अर्जित कर रहे हैं. उनके बगीचे का अनार अब विदेशों तक निर्यात होता है.
यह बदलाव किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि एक सही फैसले से आया. जैन इरिगेशन के भगवा टिश्यू कल्चर अनार के पौधों, ड्रिप सिंचाई और फर्टिगेशन तकनीक ने उनकी खेती की पूरी तस्वीर बदल दी. आइए, जानते हैं उनके इस प्रेरक सफर की पूरी कहानी.
नारिंगारामजी की औपचारिक पढ़ाई सिर्फ पाँचवीं कक्षा तक हुई. बचपन से ही वे परिवार की खेती से जुड़े रहे और पूर्वजों की पारंपरिक खेती को नज़दीक से देखते आए. आठ सदस्यों वाले इस परिवार की आजीविका का एकमात्र सहारा खेती ही थी, जिससे साल में कभी ₹50 हजार तो कभी ₹1 से 1.5 लाख रुपये तक की आय हो पाती थी.
संसाधन सीमित थे, पर सोच असीमित. नारिंगारामजी का मानना था कि अगर किसान नई तकनीक और आधुनिक पद्धतियाँ अपनाए, तो खेती को कहीं अधिक लाभदायक बनाया जा सकता है. इसी विश्वास के साथ उन्होंने आसपास के प्रगतिशील किसानों का एक समूह बनाया और उन्नत खेती समझने के लिए देश के अलग-अलग राज्यों का भ्रमण शुरू किया.
मेरी पढ़ाई केवल पाँचवीं कक्षा तक हुई है, लेकिन मेरे मन में हमेशा खेती में कुछ नया करने और बेहतर अवसर तलाशने की इच्छा रहती थी.
इसी भ्रमण के दौरान उन्हें गुजरात जाने का मौका मिला, जहाँ पहली बार उन्होंने जैन इरिगेशन के मार्गदर्शन में विकसित अनार के बगीचे देखे. अनार की उत्कृष्ट गुणवत्ता, स्वस्थ पौधे और किसानों की आर्थिक प्रगति ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया.
प्रेरित होकर वे सीधे जलगांव स्थित जैन इरिगेशन पहुँचे. वहाँ उन्होंने टिश्यू कल्चर के पौधों, ड्रिप सिंचाई और फर्टिगेशन प्रणाली को करीब से देखा और समझा. कंपनी के प्रदर्शन प्लॉटों पर अनार की सफल खेती देखकर उनके मन में यह विश्वास जागा कि सही तकनीक और मार्गदर्शन मिले तो उनके अपने क्षेत्र में भी अनार उगाया जा सकता है. फैसले को अंतिम रूप देने से पहले उन्होंने तीन बार जैन इरिगेशन जाकर विशेषज्ञों से चर्चा की और अनार खेती के हर पहलू को बारीकी से समझा.
यह राह आसान नहीं थी. नारिंगारामजी के माता-पिता और आसपास के कई किसान इस फैसले के खिलाफ थे. उनका मानना था कि रेतीली ज़मीन और कठोर मौसम में अनार की खेती कभी सफल नहीं हो सकती. लेकिन जैन इरिगेशन के डेमो प्लॉट और कृषि वैज्ञानिकों एवं एग्रोनॉमिस्ट्स से हुई विस्तृत चर्चा ने उनका आत्मविश्वास और मज़बूत कर दिया. यही दृढ़ निश्चय उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ.
मैंने तय कर लिया था कि यदि खेती में बदलाव लाना है, तो जोखिम उठाना ही होगा.
21 फरवरी 2020 को नारिंगारामजी ने अपने 10 एकड़ खेत में जैन टिश्यू कल्चर के भगवा अनार के 3,500 पौधे 13×9 फीट के अंतर पर लगाए, साथ ही 6,500 गूटी पौधे भी लगाए. सटीक जल प्रबंधन के लिए हर पौधे पर 6 ड्रिपर लगाए गए, हर कतार में दो लेटरल पाइप बिछाए गए और ड्रिपर का डिस्चार्ज 4 लीटर प्रति घंटा रखा गया. इसके साथ जैन की फर्टिगेशन प्रणाली से पौधों को ज़रूरत के मुताबिक पानी और पोषक तत्व मिलते रहे.
आज उनके पूरे 40 एकड़ खेत में शत-प्रतिशत जैन ड्रिप सिंचाई प्रणाली काम कर रही है.
इसकी शुरुआती लागत भले ही कुछ अधिक हो, लेकिन एक बार लगाने के बाद रखरखाव का खर्च लगभग नगण्य होता है. पाइप और फिटिंग की गुणवत्ता इतनी अच्छी है कि वे वर्षों तक बिना किसी परेशानी के काम करते हैं.
पौधे लगाने के कुछ ही महीनों में टिश्यू कल्चर और गूटी पौधों का अंतर साफ दिखने लगा. जैन टिश्यू कल्चर के पौधे ज़्यादा स्वस्थ, हरे-भरे और एकसमान वृद्धि वाले थे. करीब ढाई साल बाद, जुलाई 2022 में पहला बहार शुरू हुआ और यहीं से आमदनी का ग्राफ ऊपर चढ़ता गया.
पहला बहार (जुलाई से दिसंबर 2022): लगभग 30,000 किलो उत्पादन, औसतन 8.5 किलो प्रति पौधा. आय लगभग ₹28 लाख, कुल खर्च ₹17.5 लाख.
दूसरा बहार (2023): उत्पादन बढ़कर लगभग 90 टन पहुँचा, औसतन 25.7 किलो प्रति पौधा. आय लगभग ₹75 लाख, खर्च करीब ₹20 लाख.
तीसरा बहार: उत्पादन और गुणवत्ता दोनों ने नया रिकॉर्ड बनाया. औसतन 40 किलो प्रति पौधा फल मिला और आय लगभग ₹1 करोड़ 68 लाख रुपये तक पहुँची, जबकि खर्च करीब ₹20 लाख ही रहा.
जहाँ कभी सालभर की मेहनत के बाद ₹50 हजार से 1.5 लाख की आय होती थी, वहीं आज एक एकड़ अनार की खेती से लगभग ₹14.8 लाख का शुद्ध लाभ मिल रहा है.
नारिंगारामजी के बगीचे के अनार की गुणवत्ता शुरू से ही उत्कृष्ट रही. रंग, आकार, चमक, वज़न और आंतरिक गुणवत्ता इतनी बेहतर थी कि उनका माल निर्यात के लिए चुना गया. उस समय जब स्थानीय बाज़ार में अनार लगभग ₹100 प्रति किलो बिक रहा था, तब उनका एक्सपोर्ट क्वालिटी वाला अनार ₹175 प्रति किलो के भाव से बिका. खास बात यह रही कि जो फल निर्यात के लिए नहीं चुने गए, यानी रिजेक्ट माल भी स्थानीय बाज़ार में ₹100 प्रति किलो के अच्छे भाव से बिक गया.
यह सिर्फ आर्थिक सफलता नहीं थी, बल्कि इस बात का प्रमाण भी था कि किसान गुणवत्ता पर ध्यान दे तो बाज़ार बेहतर मूल्य ज़रूर देता है.
आज नारिंगारामजी के खेत में 5 से 6 साल पुराने अनार के पौधे पूरी तरह स्वस्थ और हरे-भरे हैं. पौधों को रोगों से सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने शुरू से ही नीम आधारित उत्पादों और नीम खली का नियमित उपयोग किया, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ी और रासायनिक दवाओं पर निर्भरता घटी.
चुनौतियाँ खेती में कभी खत्म नहीं होतीं. पिछले साल क्षेत्र में सामान्य से अधिक बारिश हुई, जिससे जलभराव और रोगों का खतरा बढ़ गया था. लेकिन ड्रिप सिंचाई, सोच-समझकर किए गए जल प्रबंधन और निचरेवाली रेतीली ज़मीन की वजह से स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में रही.
अनार से मिली आय ने नारिंगारामजी के परिवार की पूरी तस्वीर बदल दी. उन्होंने लगातार खेती में निवेश किया, बगीचे का विस्तार किया और आधुनिक प्रबंधन को अपनाया. खेती से मिले मुनाफे के बल पर उन्होंने परिवार के लिए एक आधुनिक घर बनवाया और लगभग 100 बीघा अतिरिक्त कृषि भूमि भी खरीदी.
सबसे बड़ी खुशी यह है कि जो बच्चे पहले गाँव में सीमित अवसरों के बीच पढ़ते थे, आज मैं उन्हें जोधपुर और दिल्ली जैसे शहरों में उच्च शिक्षा दिला रहा हूँ. यह किसी भी आर्थिक उपलब्धि से बड़ी खुशी है.
अपने अनुभव के आधार पर नारिंगारामजी हर अनार किसान से एक बात ज़रूर कहना चाहते हैं. अगर कम लागत में अधिक और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन चाहिए, तो शुरुआत जैन टिश्यू कल्चर अनार के पौधों से करें. उनके अनुसार ज़्यादातर बीमारियाँ सस्ती गूटी के ज़रिए ही खेत में आती हैं, जबकि जैन टिश्यू कल्चर के पौधे तेल्या, विल्ट (मर रोग) और नेमाटोड जैसी बीमारियों एवं कीटों से मुक्त होते हैं.
कई किसान पैसे बचाने के चक्कर में अपनी फसल गँवा देते हैं. शुरुआत में बचाए गए पैसे आगे चलकर बड़े नुकसान का कारण बनते हैं.
वे यह भी मानते हैं कि सफलता सिर्फ अच्छी पौध सामग्री से नहीं मिलती. पौधों की ट्रेनिंग और प्रूनिंग, सही जल व्यवस्थापन, बदलते मौसम के अनुसार क्रॉप कूलिंग और क्रॉप कवर, कीट एवं रोग प्रबंधन, फलों के लिए फ्रूट कवर और पौधों की अवस्था के अनुसार फर्टिगेशन, ये सब मिलकर अनार की खेती को सफल बनाते हैं.
नारिंगारामजी इस पूरी यात्रा में जैन इरिगेशन की टीम के योगदान को बेहद अहम मानते हैं. पौधों के चयन से लेकर बगीचे की स्थापना, ड्रिप सिंचाई, फर्टिगेशन, वैज्ञानिक तकनीक, समय-समय पर तकनीकी मार्गदर्शन और फर्जी सलाहकारों से बचाव तक, हर चरण पर जैन के एग्रोनॉमिस्ट्स और पूरी टीम ने उनका साथ दिया.
आज मैं जिस मुकाम पर खड़ा हूँ, उसमें मेरी मेहनत के साथ-साथ जैन इरिगेशन की तकनीक, गुणवत्ता और समर्पित टीम का भी महत्वपूर्ण योगदान है.
जालोर की रेतीली ज़मीन पर खड़ा नारिंगाराम चौधरी का यह हरा-भरा बगीचा आज हर उस किसान के लिए एक संदेश है कि अगर बदलाव अपनाने का साहस हो, नई तकनीक पर भरोसा हो और गुणवत्तापूर्ण कृषि आदान चुने जाएँ, तो खेती में संभावनाएँ असीम हैं.
